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Tuesday, July 29, 2014

मनु

कल-कल छल- छल कर,
संगीत सुनती थी जो नदी कभी। 
आज उसके स्वर मैले- मैले से क्यों है ?

उसकी एक झंकार से नाच उठता था मनु !
आज उसके कान बैरे- बैरे से क्यों है ? 

सप्तक जैसी मछली तैरती थी,
जिसके आँगन में,
आज उसकी गति गन्दी और मंदी क्यों है ?

किनारे उसके बैठकर,
लिलिमा को निहारता था मनु!
आज उसकी निगाहें अंधी- अंधी सी क्यों है ?

माना की शिव मजबूर था,
पर मनु भी अपने ज्ञान में चूर था। 

बेगुनाह निर्दोषों को मारने का शिव को है एसाहस,
पर इसके सिवा और कोई बिकल्प नहीं था शिव के पास। 
मैंने तो हल्का सा कान मरोड़ा है मनु!
दर्द हुआ अगर तो क्षमा करना। 

सोचा था तूने मनु!
दर्शन करने हम नहीं शिव आयेंगे,
आधुनिकता की नीव से हम शिव को झुकाएँगे। 

इतना जहर पिला दिया तूने मुझे मनु!
कंठ ही नहीं पूरा शरीर हुआ मेरा नीलाकार,
आँखों से आंसू बनकर निकल रहा है अब ये बहार।  


प्रदीप सिंह रावत खुदेड़''
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