मै जीना चहाता हूँ उन पलो को जो मैंने अपने गाँव अपनी पट्टी में बिताये थे।
मै लिखना चहाता हूँ उस पाटी पर क, ख, ग, जो मेरे दगड्यो ने मिटाये थे ।।
मै टाँगना चहाता हूँ फिर उस खूँटी पर अपने कपड़े जहाँ मै अपनी फटी ड्रेस टंगा करता था।
मै फिर धूल फाँकना चहाता हूँ उन रास्तों की जहाँ मै भागा करता था।
याद है मुझे वह जंगल में पेड़ की टूक पर चड़कर वह हिमालय को टक ना।
दूसरे के बैलो के गले से घंटियाँ चुराकर छुपाकर रखना ।
मै जीना चहाता हूँ उन पलो को जो मैंने अपने गाँव अपनी पट्टी में बिताये थे।
मै लिखना चहाता हूँ उस पाटी पर क, ख, ग, जो मेरे दगड्यो ने मिटाये थे ।।
गाय और बैल की पुंछ पकड़ कर हम घर की तरफ दौड़ा करते थे ।
पन्देरे में रखे दूसरे के कनस्तर को पत्थर से फोड़ा करते थे ।
शनि और इतवार की रात को फिल्म देखते हुए भट्ट खाना ।
झट बिजली गयी ना, कि दूसरो पर लात घुसे चलाना ।
मै जीना चहाता हूँ उन पलो को जो मैंने अपने गाँव अपनी पट्टी में बिताये थे ।
मै लिखना चहाता हूँ उस पाटी पर क, ख, ग, जो मेरे दगड्यो ने मिटाये थे ।।
रुडियों में माँ हमें सुलाती थी पर, हम माँ को ही सुलाया करते थे ।
घर से निकल नंघे बदन तालाब और बांध में छलांग लगया करते थे ।
गोऱ्या छोरो के साथ कभी - कभी ताश खेलना सिखा करते थे ।
स्कूल से चौक चुराकर रास्ते में प्रेमियो का नाम लिखा करते थे।
मै जीना चहाता हूँ उन पलो को जो मैंने अपने गाँव अपनी पट्टी में बिताये थे।।
हाँ पर मै उन गलत किस्सों को नहीं दोहराना चहाता जो मैंने बचपन में किये थे।
पापा की बीड़ी के टुडे उठाकर छुप छुपकर कोने में जाकर पीये थे ।
अपने खुद के नियम कानून होते थे, खुद होते थे खेल ।
कभी दोस्तों से लड़ाई झगड़ा होता था कभी होता था मेल ।
मै जीना चहाता हूँ उन पलो को जो मैंने अपने गाँव अपनी पट्टी में बिताये थे ।
मै लिखना चहाता हूँ उस पाटी पर क, ख, ग, जो मेरे दगड्यो ने मिटाये थे ।।
मै चहाता हूँ बचपन ये के हसीन दिन अपने बच्चो को भी जीने दूँ ।
बस्ते का बोझ उतरकार उनके कन्धे से, उन्हें खुली हवा में साँस लेने दूँ ।
मै जीना चहाता हूँ उन पलो को जो मैंने अपने गाँव अपनी पट्टी में बिताये थे ।
मै लिखना चहाता हूँ उस पाटी पर क, ख, ग, जो मेरे दगड्यो ने मिटाये थे ।
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