बस्तों के तले बचपन दब गया है,
माँ बाप की अपेक्षाओं तले बचपन लद गया है।
गुली डांडा होना था जिन हाथों में उनमें फोन थमा दिया,
खो-खो जिस उम्र में, उसमें फेसबुक में अकाउंट बना दिया।
खुली हवा में सांस लेना था जब तब टयूशन के कमरों में बंधक बना दिया,
दादी नानी की कहानियाँ सुननी थी जब तब कानों में इयर फोन लगा दिया।
साग भाजी खिलानी थी जिस उम्र में तब पिज्जा वर्गर खिलाते है,
संस्कारवान बनाना था जब तब उन्हे पैंसे कमाने की बिधि बताते है।
बचपन अब बचपन नही रहा हमने ंपच्चपन बना दिया,
देकर मन का बोझ उनके हाथों में मदिरा का प्याला थामा दिया।
बचपन को बचपन रहने दो यारों सयाना मत बनाओं,
मिटठी में खेलने दो बचपन को नकामियाँ उनकी मत गिनाओं।
बेद ग्रथ गीता पढ़ाओं उन्हे, पढ़ाओं वीरों की कहानियाँ,
लौटकर वापस बचपन नही आयेगा करने दो उन्हे नादनियाँं।
बचपन तो खुशी है आँगन की बचपन तो माता पिता की प्रेम की डोर,
वह घर ही क्या दोस्तों जिसमें नही सुनायी दे बचपन का शोरं
बस्तों के तले बचपन को मत लदने दो,
अपनी अपेक्षाओं के तले बचपन को मत दबने दो।
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माँ बाप की अपेक्षाओं तले बचपन लद गया है।
गुली डांडा होना था जिन हाथों में उनमें फोन थमा दिया,
खो-खो जिस उम्र में, उसमें फेसबुक में अकाउंट बना दिया।
खुली हवा में सांस लेना था जब तब टयूशन के कमरों में बंधक बना दिया,
दादी नानी की कहानियाँ सुननी थी जब तब कानों में इयर फोन लगा दिया।
साग भाजी खिलानी थी जिस उम्र में तब पिज्जा वर्गर खिलाते है,
संस्कारवान बनाना था जब तब उन्हे पैंसे कमाने की बिधि बताते है।
बचपन अब बचपन नही रहा हमने ंपच्चपन बना दिया,
देकर मन का बोझ उनके हाथों में मदिरा का प्याला थामा दिया।
बचपन को बचपन रहने दो यारों सयाना मत बनाओं,
मिटठी में खेलने दो बचपन को नकामियाँ उनकी मत गिनाओं।
बेद ग्रथ गीता पढ़ाओं उन्हे, पढ़ाओं वीरों की कहानियाँ,
लौटकर वापस बचपन नही आयेगा करने दो उन्हे नादनियाँं।
बचपन तो खुशी है आँगन की बचपन तो माता पिता की प्रेम की डोर,
वह घर ही क्या दोस्तों जिसमें नही सुनायी दे बचपन का शोरं
बस्तों के तले बचपन को मत लदने दो,
अपनी अपेक्षाओं के तले बचपन को मत दबने दो।
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