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Thursday, January 9, 2014

MORI MELA माहौरू लगाण जगार

दिशा कूs माहौरू, माहौरू लगाण
बांझू माहौरू, माहौरू लगाण
भैजी चल्दू बणाण, माहौरू लगाण
दिशा कूs माहौरू, माहौरू लगाण

यह उस जगार की चंद पंक्तियाँ है जो मौरी मेले कि ब्याख्या को दर्शाती है। जैसे कि मैंने पहले भी लिखा है कि मौरी शब्द माहौरू शब्द से बना है। और जिसका अर्थ होता है बंजर जगह (राज्य) को खुशहाल और समृद् बनाना। माहौरू मात्र केवल एक शब्द नहीं है।  अगर हम शब्द की गौण रूप की ब्याख्या, और इसके मूल भाव को देखेंगे तो हमें यह ज्ञांत होता है कि यह बहुत उंचमतम  स्तर और गहराई  का शब्द है। यह शब्द मौरी मेला की  पूर्ण ब्यख्या करता है। मै आपको एक उदाहरण से इस बात को समझता हूँ ।

"घर'' घर मात्र एक शब्द या चार दीवारों का ढांचा नहीं है। (जिसमे खिड़की दरवाजे रोशनदान आदि चीजे शामिल है) घर तभी पूर्ण घर माना जायेगा जब उसमे रोजमरा कि वह सारी  चीजे होंगी जो एक जीवात्मा को अपने जीवन यापन के लिए चाहिए होती है और उस घर में वह लोग या जीवात्माएं मौजूद हो ( आदमी जानवर) उनकी आस्था के लिए मंदिर पूजा सामग्री तथा आधुनिक वस्तुएं हो।  ये सारी  चीजे एक घर को पूर्ण घर का दर्जा प्रदान करती है।  अगर किसी घर के अंदर कुछ भी न हो तो वह घर नहीं कहलायेगा।
ठीक उसी प्रकार माहौरू मात्र एक शब्द नहीं है। इस शब्द के पीछे रूपेणा  के राजपाट के उद्धार के लिए किये हुऐ कार्य को दर्शाता है । कुछ लोग माहौरू जागर को रुपाई लगाने तक सीमित रखते है पर ऐसा है नहीं ? माहौरू शब्द हरियाली का प्रतीक है यह पूरे राज्य को फिर से पुनर्जिवित करने से सम्बंध  रखता है।

ये तो हुई माहौरू जागर की बात। अब मै रूपेणा कि जागर कि बात करता हूँ । जब रूपेणा का जागर लगता है तो पांडव नाज निशाण, और दोण कंडी लेकर नृत्य करते है। ऐसा यह दर्शाने के लिए किया जाता है कि हम किस तरह रूपेणा  को दान स्वरुप ये सारी चीजे देते है और  मेला ख़त्म होने पर हम उस लड़की को जिसमे रूपेणा का भीर आया होता है को ये सारी चीजे दान में देते है। यही पर माहौरू जागर कि ब्याख्या पूर्ण होती है

खुदेड़  
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