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Sunday, April 5, 2015

मैं दिल्ली हूँ,, 06.04.2015



मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

अपने सफर की कहानी आज तुम्हें बताऊँगी,
कभी खुशी कभी गम के पल तुम्हें सुनाऊँगी।
मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

आजादी के बाद का पहले दशक का दौर था,
चारों तरफ खुशी का महौल था।
मुझे सजाने और सवारने की योजानाऐं बनायी जा रही थी,
मै हिन्दुस्तान का दिल बनूँ ऐसी नीतियाँ चलायी जा रही थी।
मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

नेहरू, पटेल, शात्री जी के हाथों में मेरी कमान थी,
मुझे बिकास के पथ पर दौड़ायेगें ये उनकी जबान थी।
राजनेता बदले तो राजनीति बदलने लगी,
अब मेरी किसमत इन्द्रा के हाथों से चलने लगी।

अभी मैने बिकास का चंद फासला ही तय किया था,
कि नेताओं पर सता का नशा छा गया।
मेरे हितों को छोड़कर कुर्सी का मोह आ गया।
मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

कैसे भूल जांऊँ उस दौर का,े
जब मुझे इमेरजन्सी में कैद किया गया था।
कैसे भूल जाऊँ उस दौर को,
जब नागरिक समाज के बोलनें पर प्रतिबंध लगा दिया था।

लोकतंत्र अधमरा लहुलुहान पड़ा था इन्द्रा के हाथो से,
मेरा दमन भीग रहा था संविधान के आँसूओं से।
जेपी के अन्दोलन से मेरी धरती पर नई क्रांति आयी थी,
सिहासन खाली करों, जनता आती है। के नारों से नयी जागृती आयी थी।
यही खुशी के पल मुझे सकून दे गये,
मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

अभी मै थोड़ी सम्भली थी कि,
चैरासी के दंगों से मैं दहल गयी,
देखते-देखते हिंसा की आग चारों तरफ फैल गयी।

सैकड़ो लोगों का सिर कलम किया गया,
मेरे आँचल पर एक दाग और दिया गया।
टूटना ही मेरे नसीब में लिखा है,
मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँं।

सन दो हजार में पहली बार मैने बम धमाकों को झेला था,
मुम्बई के बाद दहशदगर्दो ने दिल्ली में मौत का खेल खेला था।
इसके बाद तो यह सिलसिला बदस्तूद चलता रहा,
किसी न किसी का अपना पराया इन धमाकों मे मरता रहा।
आखिर कब तक मै इस दर्द को सहूँगीं,
मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

ब्लू लाइन के नीचे मरती जिन्दगियों में मैने देखा है,
फुटपात पर पलती जिंदगियों को मैने देखा है
चैराहे पर ढलते बुढापे को मैने देखा है
कचरे से पलास्टिक से पेट भरते गाय को मैने देखा है
तन्दूर में इन्सानियत को जलते हुऐ मैने देखा है।
यमुना को नल नालों से गंदा करते हुऐ मैने देखा है,
मैं दिल्ली हूँ,े
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

मेरी लज्जो डरती है अपनों के बीच मे,
मैं कहाँ छुपाऊँ उसे।
मेरी लज्जो अपना दर्द मुझसे कहती है,
मैं कैसे बचाऊँ उसे।
वह सिसकती है, मैं बेचैन हूँ,
मैं दिल्ली हूँ,।
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

मुझसे अपने ही लोग क्यो इतना नफरत करते हैं,
मेरे आँचल को क्यों गंदा करते है।
तुम तो आओगे जाओगे,
मुझे तो यही रहना हैं,
ऐसे कई घावो को सदियों तक सहना हैं।
मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।

मुझसे तुम एक वादा कर लो,
कम नही ज्यादा कर लो।
तुम सुधर जाओगे तो सारी दिल्ली सुधर जायेगी,
देखते ही देखते सारी दिल्ली बदल जायेगी।
मैं दिल्ली हूँ,,
आजादी के बाद दिल्ली हूँ।
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