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Wednesday, November 12, 2014

मेरा गाँव


सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

कुंजेठा गुमाई पड़ता है इसके पश्चिम में 
गंगोटी पड़ता है मेरे गाँव के दक्षिण में 
पूर्व दिशा में पड़ती है पाबै की धार 
उत्तर दिशा मे पड़ती है पुन्डोरी की सार 
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव


हर बारह वर्ष में मौरी का मेला यहाँ लगता है
छः महीने तक संस्कृति का पर्व यहाँ चलता है 
छोटी सी एक नदी कुछ दूरी पर बहती है
कभी इसमें अति पानी था अब खाली खाली रहती है
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

आधुनिकता की दौड़ में मेरा गाँव सरपट दौड़ रहा है
ईंट के मकान बनाता पत्थर के मकान तोड़ रहा है
गाँव के ऊपर स्कूल में शिक्षा का स्तर नहीं पहले जैसा 
गुरु अब गुरु नहीं रहा, अब तो उसे चये बस पैंसा 
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

न अब गाय है न भैंस, न हल जोतते अब बैल से 
अन्न अनाज अब दुकान से, दूध भी आता अब शहर से
प्यार मोहब्बत तो है पर अपनापन नहीं है
बच्चे तो है पर उनमे अब बचपन नहीं है
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

इसी गाँव में मेरा भी छोटा सा रैन बसेरा है
यही कोने पर मैंने अपने बचपन को उकेरा है 
मुझे नहीं मालूम अब यहाँ कब लौट पाउँगा 
क्या अपनी ज़िन्दगी के बचे लहमे यहाँ काट पाउँगा ?
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव


प्रदीप सिंह रावत ''खुदेड़'' 
तारीख १३.११.२०१४ 
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