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Friday, January 23, 2015

माया का रोग मा


अब से पैली मं नई जाणी
मायामा लगैकी ज्यू
बन बनि का रोग रोग लगी गेन

माया का रोग मा, कभी दुःख कभी सुख
मायादार की मीठी छ्वीमा न तिस न भूख
दगड़यों दगडी मा भी डूब जन्दों इनकी याद मा
नींद बिरड़े देंदी वा सुप्न्यों मा ऐकि रात मा
रोग क्या च में आज मिन पच्याणी
अब से पैली .................

फूलूका बीच मा भी अलग च विकी पच्याण
डाली बोटयूं को भी विकी दगडी बच्याण
फ्योली भी वी बटी रंग मांगी पैंचू लिजंदी
कोयल भी सुरताल मांगणू विमा ही आंदी
इनमा कवि किले णी लग विकी बाणी
अब से पैली .................

न काम मा लगदु मन मेरु, न घरबार मा
अब त दिन कटेन्दा बस विका इन्तजार मा
मेरु मन लगगी विकी सतरंगी चूड़ियों मा
मेरु तन रंगगी विका सोलह श्रृगार मा
कब तक गट्याणु रोलु विकी गाणी
अब से पैली .................

मन की मुराद पूरी व्हे जांदी जब वा हैसदी च
काम देव भी शरमे जांदू जब वा देखदी च
अब माया कू रोग हद  पार करगे 
आंख्यूं बटी की सरातन बदन फैलगे
अब यांकी दारू दवै विनी बताणी
अब से पैली .................

खुदेड़
23.01.2015


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