अपने दर्द को अपनों से छुपता हूँ मैं,
अपने दर्द की दास्ता अपने आप को ही सुनाता हूँ मैं।
जिंदगी में अपनों के बोझ को अकेले उठाता हूँ मैं,
खुद असहज रहता हूँ, पर अपनों को हर वक्त हँसता हूँ मै।
जबसे ये जमाना वेरूखी दिखाने लगा,
तब से माँ का प्यार और भी याद आने लगा।
गाँव में जब गिर जाया करता था मै,
कई हाथ आगे आ जाते थें मुझे उठाने के लिए,
पर जब कभी शहर में गिरता हूँ,
कई मोबाईल आगे आ जाते हैं पिक्चर बनानें के लिए।
शहर जबसे यूं ब्यवहार जताने लगा,
तब मुझे गाँव याद आने लगा।
26/0 2 /15
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