ज़िन्दगी में हर मोड़ पर मै टूटा हूँ,
सब के साथ चला मंज़िल के और,
फिर भी पीछे छूटा हूँ।
जब- जब भी मैंने आशाओं के किनारों को जोड़ा है,
तब-तब मुझे निराशाओं की दीवारों ने तोड़ा है।
मै फिर उठूँगा,
फिर मंज़िल की और चलूँगा,
तुम चलो दोस्तों !
मै धीरे- धीरे आकर तुम्हें मंज़िल पर ही मिलूंगा।
"खुदेड़"
20 .05 .2015
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