आओ पीछे मुड़कर देखें क्या खोया है
आगे मुड़कर देखे क्या पाना है
शायद पहाड़ को खोया है, खोये हुए पहाड़ को पाना है
बस एक ही बिकल्प, चकबंदी को अपनाना है
बंजर हुये खेतों में अगर हरियाली लानी है
खंडर होते घरों में अगर खुशहाली लानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
गूंजेंगी किलकारियां फिर उन स्कूलों में
जो अभी सूनें पड़े है
खनकेगी चूड़ियाँ फिर उन घरों में
जो अभी बिरान खड़े है
मिलकर हमें एक नयी सुबह लानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
मेरे खेत बंजर हो जायेंगे
इस दर से मुझे माँ को निजात दिलानी है
पहाड़ का पानी और जवानी
पहाड़ में नहीं रूकती इस दाग से निजात भी दिलानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
खुद का खेत, खुद की रखवाली
हर दिन बग्वाल, हर दिन दीवाली
मेनहत कम लागत ज्यादा
ऐ है चकवन्दी का वादा
बस एक निति हमें बनानी है
एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
प्रदीप सिंह रावत ''खुदेड़''

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