कही लोग यह भ्रान्ति फैलते है कि मौरी का मुख्य किरदार नारायण है। जो किसी भी तरह से तर्क सांगत नहीं है। मौरी मेले में हर किरदार अपने आप में मुख्य किरदार कि भूमिका में है। अक्सर लोग दैणा हुया खोली का गणेशा, दैणा हुया मोरी का नारायण।इन पंक्तियों से माओरी को जोड़ते है। जब कि इन पंक्तियों से मौरी के नारायण का दूर -दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। ये पंक्तियाँ श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी ने रची है, और इस सम्बंध में मेरी नेगी जी से काफी गहराई से बात हुयी है, उन्होंने मुझसे कहा कि मेरी इन पंक्तियों का इस मेले से कोई वास्ता नहीं है, मैंने तो यह मात्र गाने के लिए इन पंक्तियों को अपने अलंकार में सजाया है, और जहाँ तक बात रही मोरी के नारायण की तो इस गीत में मोरी का नारायण का सम्बन्ध घर में दाक्षिण दिशा की खिड़की में जो सूर्या भगवान् होते है उनसे है।
इस प्रकार कुछ लोग मौरी को मोरी लिखते है जो किसी भी तरह से उन्चित नहीं है, मोरी में "ओ" की मात्रा लगायी जाती है और मौरी में "औ" की मात्रा लगायी जाती है।यहाँ पर मोरी का मतलब खिडक़ी से है। और मौरी का अर्थ माहौरू से है।
वैसे भी अगर देखा जाए तो इस मौरी मेले में नारायण नकारत्मक भूमिका में है। क्योंकि उसने कुसमा कुवेण के लिए अपनी रानी रूपेणा तथा अपने बच्चों को छोड़ दिया था और जब उसके राजपाट को राक्षसों ने उजाड़कर बंजर बना दिया था। उसके कुलवंशों को भी काल का ग्रास बाना बाना दिया था। फिर भी उसने अपने राज्य की सुद नहीं ली और। शयाद इस सच्चाई को कोई नही नकार सकता।
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