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Thursday, March 10, 2016

तुम फंसे हो


तुम फंसे हो न जाने किस खेल में,
तुम्हारे लिए अनशन पर है कोई जेल में।
न जाने किसे के लिए प्राण त्यागने को तत्पर है,
धरती माँ को न लुटे को इस लिए हठ पर है। 
धरती बेचने वालों की खड़ी वहाँ फौज है,
आंदोलकारी नानीसर में डंडे खाते दलालों की मौज है। 
तुम फंसे हो न जाने किस खेल में,
तुम्हारे लिए अनशन पर है कोई जेल में।

गाँव में बाघ घुसता आदमी को खाने को,
जंगल कौन जाये अब बखरी चराने को। 
सूअर भी बाघ बनकर अब हमें डराने लगा,
सियार भी अब हमें मुहँ चिराने लगा।
तुम फंसे हो न जाने किस खेल में,
तुम्हारे लिए अनशन पर है कोई जेल में।

सल्ट से गायब हो रही है बहु बेटियां,
तुम खेल रहे हो  राजनितिक गोटिया। 
वालों में आए गए तुम छोड़कर खाल और ताल को,
बेचने वाले पहुँच गए वहाँ कुमौं और गढ़वाल को।
तुम फंसे हो न जाने किस खेल में,
तुम्हारे लिए अनशन पर है कोई जेल में।

तिवारी जी पर गुंडे हमला करते ननिसार में,
मैदान में आने दो तुम इन्हे सत्रह के वार में।
स्याही भले मिट चुकी है ऊँगली की,पर वादे याद है, 
कौन आया था जनता के आँसू पोछने सारे प्यादे याद है। 
तुम फंसे हो न जाने किस खेल में,
तुम्हारे लिए अनशन पर है कोई जेल में।

कल्जीखाल ब्लॉक के लोगों ने प्रशासन को आईना दिखाया है
अपने अपने हौंसले से चार मील सड़क को बनाया है
अगर हम एक हो चले तो, चटान को भी तोड़ सकते है
साथ अगर चलो तो नदी को भी मोड़ सकते है
तुम फंसे हो न जाने किस खेल में,
तुम्हारे लिए अनशन पर है कोई जेल में।

प्रदीप रावत "खुदेड़"
दिनाँक - 8 . 03 . 2016 
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