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Wednesday, May 4, 2016

कहाँ जाऊँ

मुझे प्यास लगी है मै कहाँ जाऊँ,
चारों तरफ धधक रही है अग्नि,
क्या मै इस अग्नि में जल जाऊँं,
मुझे प्यास लगी है मै कहाँ जाऊँ।

हलक कंठ सूख रहे है मेेरे बच्चों के
कोई तो इनके कंठों में उतारों नीर।
कब तक बांधाकर रखूँ मैं इन्हे धीर,
क्यों मै उन्हे और दिलासा दिलाऊँ।

आँखों के आगे छा रहा है मेरे तन,
बिन पानी के तक्षु भी नही होते अब नम।
इन्सान ने सारी धरा पर अपना अधिपत्य कर लिया,
छीनकर मेरे आँगन को अपना खूंटा गढ़ लिया।
क्या करूँ मै! कोई तो मुझे रहा दिखलाओं।

अगर लगी भूख तो मै पत्ते जड़ खाऊँ,
पर बिन जल के मैं कैसे जिन्दा रह पाऊँ।
हे अनंत आकाश में तैरते घने मेघों,
कुछ इस अबला की तरफ भी तो देखों।
आस मेरी तुम्ही पर, तुम्हे ही अपनी ब्यथा सुनाऊँ।

भागते फिरते हम जल के लिए वन-वन में,
हौंसला टूट चुका है अब ऊर्जा शेष नही तन में।
क्या अब मै भी मानव की तरह हिंसा पर उतर आऊँ,
मुझे प्यास लगी है मै कहाँ जाऊँ।
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