आज इस शाम को और सुहानी होने दो,
गजल जो माँ पर लिखी है मैने!
उसे अभी और रूहानी होने दो,
जब से अपने पंखों पर उड़ा हूँ असमा मे,ं
आज बडे़ सालों बाद लौटा हूँ माँ के जहां में।
बहुत दिनों बाद माँ ने पुराना आँचल,
नये बक्से से निकाला है अपना,
आज मुझे उस आँचल में सोने दो।
बहुत तड़फी है माँ मेरी याद में,
आज माँ के साथ मुझे खूब रोने दो।
कल उड़कर लौट जाउँगा अपने मकान में,
सब खमोश हो जाओं अब!
आज इस घर में मेरे होने का अहसास हाने दों।
अलहड़ पन की फिर नादानी होने दों।
आज इस शाम को और सुहानी होने दो,
गजल जो माँ पर लिखी है मैने!
उसे अभी और रूहानी होने दो,
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