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Friday, May 13, 2016

खोखले है महिला सशक्तिकरण के दावे

गाँव में एक दिन मुझे बहुत साल बाद मेरी एक सहपाठी मिली, जिसका नाम गीता था,बाहरवी के बाद उसकी शादी हो गयी थी जिसकी शादी काफी साल पहले हो गयी थी। अभी उसकी उम्र बतीस साल के करीब होगी, मैने उसकी हालत देखी तो मैं आश्र्चय चकित रह गया, उसके चेहरे पर झुरियाँ पड़ी हुई थी। पर उसके शरीर और चेहरे को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह पचास साल की होगी, जब कि उसका बिवाह अच्छे परिवार में हो रखा है, घर परिवार में किसी भी चीज की कमी नही हैं। पर वह काम के बोझ के तले इस कदर दब चुकी है कि उसने कभी अपने स्वास्थय पर ध्यान नही दिया, अपने लिए कभी भी समय नही निकाला, ये केवल अकेले गीता की कहानी नही है। आज पहाड़ की मातृ शक्ति इसी बोझ के नीचे दबी हुई हैं। कितना हास्यपद है कि पहाड़ की 78 प्रतिशत महिलाऐं कुपोषण का शिकार है जिस पहाड़ में प्रोटिन और बिटामिन के भरपूर संशाधन है गीता भी  कुपोषण की शिकार महिलाओं में से ही हैं।http://www.dpmiindia.com/

उत्तराखंड बदलाव के दौर से गुजर रहा है पर यह बादलव वहाँ की मातृशक्ति के लिए नमात्र बनकर रह गया है। पहाड़ की महिलाओं केी हालत बद से बदस्तर होती जा रही हैं वह काम के बोझ के तले इतना दब चुकी है, अब वह पहाड़ में रहना ही नही चाहती। वह पहाड़ की जिन्दगी से छुटकारा पाना चाहती हैं। बिशेष कर आज के दौर की लड़कियाँ पहाड़ में बिल्कुल भी नही रहना चाहती है। पहाड़ में अब वही मातृ शक्ति रह रही जिनके पति या तो गाँव में ही रहते हैं या फिर जिनकी नौकरियाँ यही पहाड़ हैं। वरना पहाड़ में हालत इस कदर खराब हो चुके है कि चाहे किसी भी महिला का पति शहर में छोटी सी नौकरी भी कर रहा हो वह खुद का पेट भी बड़ी मुशकिल से पाल रहा हो, फिर भी महिला उसके साथ जाना चाहती है। और उसे गाँव के इतने बड़े घर को छोड़कर मजबूरी में अपने पति के साथ छोटे से कमरे में रहना पड़ रहा हैं, जहाँ उसे बाथरूम भी शेयर करना पड़ रहा है। मातृशक्ति का यही पलायन पहाड़ के लिए अभिशाप बन गया। अगर पहाड़ से मातृशक्ति पलायन नही करती तो पहाड़ के गाँव आबाद होते। जैसे पहले होता था पति बाहर प्रदेश में रोजगार करता था तथा पत्नी अपने घर गाँव में अपने परिवार को संभालती थी, उत्तराखंड के अंदोलन में लोगों को जो सपने दिखाये गयें थे हमारे हुक्करान उस पर बिल्कुल भी खरे नही उतरे। उन्होने पहाड़ बिरोधी नीतियों को राज्य में लागू किया। वह पहाड़ को शहर बनाने पर तुले है जो कि किसी भी कीमत में नही हो सकता,

ऐसा नही है कि महिलाऐं पहाड़ में नही रहना चाहती हैं। पर वह अपने ऊपर बेबजह डाले गये बोझ से डर गयी है, बोझ भी ऐसा जिसका कोई लाभ नही है साल भर उसे अपने खेतों में सर पर उठाकर खोबर ले जाना पड़ता है पर जब फसल काटने की बारी आती है तो फसल को या तो सुअर चैपाट कर देते है या बेलगाम जानवार। कभी-कभी तो मौसम की मार भी महिलाओं की मेहनत पर पानी फेर देती है। वह पहाड़ में बिखरी हुई जोत के नीचे दबकर रह गयी है। सरकार जब तक बिखरी जोत की चकबंदी नही करती है तब तक मातृ शक्ति की इस हालत को नही सुधारा जा सकता हैं। मै ये कताई नही कहता कि चकबंदी से
शत् प्रतिशत हालत सुधर जायेंगे, पर कुछ हद तक इन हलातों में काबू पाया जा सकता है।

केवल खेती बाड़ी के बोझ के नीचे मातृशक्ति नही दबी हुई है, हलात इस कदर खराब है कि, माहिलाओं को पीने तक के पानी के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। पानी जो इन्सान की मूलभूत अवश्यकता है। अब सोचने वाली बात यह है जिस हिमालय को पूरा विश्व वाटर टैंक के नाम से जानता हों वहाँ के गाँवों को पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसना पड़ रहा हो। पंद्रह सालों में जब हमारी सरकारें गाँव में पानी ब्यवस्था नही कर पा रही हो तो रोजगार के बारे में सोचना तो बेमानी होगा।

 पहाड़ की महिलाओं के लिए भी मानसिक थकान भी उनके जीवन और उनके स्वास्थय पर बहुत बुरा असर डाल रही है। पहले गाँव में कई प्रकार के त्यौहार सामुहिक रूप से मनाये जाते थे जिससे सामुहिक त्यौहारों मंे महिलाओं अपने काम से समय निकाल कर भाग लेती थी। इसके आलावा कुछ साल पहले गाँवों में सामुहिक रूप से भी खेती-बाड़ी के कार्य किये जाते थे जिसमें “पढेली“ और “सहेली“ प्रमुख थी, इन सामुहिक कार्यो में महिलाओं पर ज्यादा बोझ नही होता था। कोई भी कार्य हंसते बात करते-करते कब समाप्त हो जाता था, उन्हे पता ही नही चलता था। इस प्रकार के सामुहिक कार्यो से महिलाओं पर मानसिक दबाव नही पड़ता था। जो सामुहिक कार्य आज के दौर में लगभग समाप्त से हो गये है।

एक और समस्या कुछ सालों से पहाड़ में महिलाओं के लिए मौत का सबक बनी हुई जब से इंसान ने जंगलों मे अतिकम्रण किया है तब से जंगली जानवरोें का शिकार गाँवों की पुरूषों के अपेक्षा महिलाये ज्यादा होने लगी है अब तो वह अकेले चरापत्ती लाने में भी डरने लगी है, पहले अकसर ऐसा नही होता था। बरसात के समय तो महिलाओं की मुसीबतों में और इजाफा हो जाता है पहाड़ों में कई बार महिलाओं की फिसलने से मौत तक हो चुकी है। कुछ साल पहले मेंरे गाँव में भी एक महिला पहाड़ से गिर गयी थी भगवान का शुक्र है कि वह बच गयी पर उस हादसे के बाद जब वह इलाज के लिए शहर गयी तो, फिर पहाड़ लौटकर नही आयभ्ं ऐसे तमाम उदहारण भरे हुऐ है पहाड़ में।

कुछ साल पहले जहाँ महिलायें अपने हितों और पहाड़ की हितो की लड़ाई भी बड़ी तन्मयता से लड़ती थी। पर न जाने अब क्यों पहाड़ की महिलाओं में पहाड़ के हितो की लड़ाई लड़ने की क्षमता खत्म सी हो गयी है। उनका आत्मबल और धर्य अब जवाब दे चुका है। वरना एक दौर था जब महिलाऐं “शराब“ अन्दोलन से लेकर “वन“ और तमाम ऐसे अन्दोलनों को अपने गाँव और ब्लाक स्तर पर चलाती थी,  शराब माफियों के खिलाफ तो निडर होकर उनकी भटियों को तोड़ देती थी, बहुत साल से इस प्रकार के समाचार पढ़ने को नही मिल रहे हैं। हाँ कुछ जगह जरूर महिलाऐं अन्दोलित है पर बाकि पहाड़ शांत सा नजर आ रहा है, पहाड़ का इतिहास गवा है जब-जब महिलाओं ने किसी अन्दोलन में सिरकत की है वह अन्दोलन जरूर सफल हुआ हैं।

अब प्रश्न यह उठता है ? क्या वकाई में पहाड़ की महिलाऐं इतना टूट चुकी है कि वह अब “गौरा“, “टिंचरी माई“, नही बन पा रही है। राजनीति में भी महिलाऐ उस स्तर तक नही पहुँच पा रही है जहाँ उन्हे होना चाहिए खासकर गाँव की महिलाऐ ंतो ब्लाक स्तर तक भी नही पहुँच पा रही हैं

स्वास्थ्य सेवाओं की तो हलात इतनी खराब है कि 108 को फोन करने पर वह एक घंटे बाद आती है। नजदीक के आसपतालों में न तो डाक्टर है और नही दवाईयाँ। अगर किसी महिला को एक कांटा भी चुब जाऐ तो उचिंत परामर्श और आसपताल में डाक्टर न होने के कारण वह घाव नसूर बन जाता है अभी हमारे एक पत्रकार मित्र की माता जी के पाँव में कांटा चुब गया था बड़ा घाव बनने के बाद जब उन्हे पास के चिकित्सा केंद्र में लेकर गये तो दवाई और डाक्टर न होने के कारण वापस घर आना पड़ा तथा पत्रकार मित्र माता जी को दूसरे दिन दिल्ली ले गये वहाँ जाकर उनका इलाज किया गया।

महिला सशक्तिकरण के लिए योजना तो बन रही है पर वह ब्लाकोे में कागजों पर सिमट कर रह गयी हैं। इन योजनाओं को गाँव तक पहँुचाने की अवश्कता है। अगर पहाड़ में महिलाओं का विकास करना है तो पहाड़ की भागौलिक प्रस्थितियों के हिसाब से विचार करना होगा, हमारी सरकारों ने भी मातृशक्ति के इस बोझ को कम करने की दिशा में धरातल पर बिल्कुल भी काम नही किया। आज उसका नतीजा है कि पिछले पंद्रह सालों में पतीस लाख लोगों ने पहाड़ से पलायन किया और इसमें से आधी से ज्यादा महिलायें भी है। अगर सरकार को सही मायने में महिलाओं के लिए कुछ करना है तो सबसे पहले महिलाओं  को सरकारी स्तर पर टेªर्निग देने की ब्यवस्था करनी होगी, महिलाओं को उनकेे अधिकार और कर्तब्यों के बारे में जागरूक करना होगा, यह टेर्निग हर छः महिने मे अलग-अलग स्तरों पर दी जानी चाहिऐ। इससे महिलाओं के आत्मविश्वास में इजाफा होगा, और वह विकास की राह जरूर बनायेगी।

मुख्यमंत्री कहते है कि हमारे डाक्टर पहाड़ जाने को राजी नही हो रहे है। तो मेरा मानना जब तक हमारे मत्री विधायक और बड़े अधिकारी पहाड़ नही चाढ़ेगें इस प्रकार की समस्या हमेशा बनी रहेगी। इस लिए मुख्यमत्री जी को उत्तराखंड की जन भावनाओं की कद्र करते हुऐ उत्तराखंड की राजधानी को स्थाई रूप से गैरसैण बना देनी चाहिऐ। जब मुख्यमत्री जी पूरा तत्र पहाड़ आयेंगा तभी इन लोगो को यहाँ के नगरिकों के दर्द का असली एहसास होगा। वरना मातृशक्ति कभी पहाड़ से गिरेगी कभी जंगली जानवारों का शिकार बनेगी, या कभी काँटा नासूर बनकर उसे हमेशा पहाड से बेमुख कर देगा।
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