मै झील हूँ मै रहना चाहती हू शांत
क्यों इंसान खलल डालता है मेरे एकांत
मै झील हूँ मै रहना चाहती हू शांत
वर्षो से मैं इस पीड़ा को सह रही हूँ
कितनों ने कंकड़ मारा फिर भी मौन रह रही हूँ
न जाने कितने सूरज निकले मुझे सुखाने को
न जाने कितने बटोई निकले मुझे हलक में उतारने को।
फिर भी वह मुझे नही सुखा पाये।
मै झील हूँ मै रहना चाहती हू शांत
क्यों इंसान खलल डालता है मेरे एकांत
मै झील हूँ मै रहना चाहती हू शांत
जब तक मैं शांत हूँ तभी तक सुंदर हूँ
अगर बहने लगी तो मैं हो जाउंगी असुंदर
मुझे गंगा की तरह मनाव के मल को नही ढोना
मुझे सागर में मिलकर अपना ये अस्तित्व नही खोना
मैं यही ठीक हूँ
मै झील हूँ मै रहना चाहती हू शांत
क्यों इंसान खलल डालता है मेरे एकांत
मै झील हूँ मै रहना चाहती हू शांत
भगवान से नाता जोड़ने के लिए हूँ निर्जन वन में
मेरी सुंदरता पर निछावर होते है तारे गगन में
चिडि़या की चहचहाट मुझे आनन्दमयी करती है
पावन की सरसराहट मुझे छूकर निकलती हैं।
मै यही पर सुखी हूँ
मै झील हूँ मै रहना चाहती हू शांत
क्यों इंसान खलल डालता है मेरे एकांत
मै झील हूँ मै रहना चाहती हू शांत
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