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Saturday, October 27, 2012

बेरोजगारी की चक्की मा मि पिसेणू छो।
ज़िन्दगी का बोझ  तोळ मि दबेणू छो।।  

डिग्री डिप्लोमा व्हेकी ते भी खाली च मेरू हाथ। 
        कभी त होलू मेरि ज़िन्दगी मा सुख कू उजेलू , कभी त जाली या दुखूँ की रात।
                हद से हद तक माँ बापू कू मे परे च बिश्वास। 
                      आज लगोलू नोकरी भोळ लगोलू लगयी च आस। 
हरेक दिन मि साक्षात कार देणू छो।
बेरोजगारी की चक्की मा मि पिसेणू छो। । 

देखि की इंटरब्यू की लाइन सोची मिन  यू भी में जन दुखी छन।  
        खाणू समणी व्हे की ते भी में जन भूखी छन।
             नौकरी की गंगा मा वी नहेणू च जैमा च म्या कू मैल। 
                   निथर इना बुरा बक्त मा त साथ भी छोड़ देणू च छैल।
सोची छो मिन बढूलू ऐथर पर मि तोळ धंसेणू छो। 
बेरोजगारी की चक्की मा मि पिसेणू छो। । 

ईख वुखा धक्का खैकी ते मि चौ दिशो भट्क्यू छो। 
        अब ना घारो छो ना बोणों, अब मि बीच मा लटक्यू छो। 
              भैबन्द  भी समझणा छन अबत मेते अफू पर बोझ। 
                  द्वी बक्त की रोटि त मिलदी च पर टोकणा  रैन्दन हर रोज़। 
चिन्ता इत्गा व्हेगी अब मि रातभर नि सेणू  छो।
बेरोजगारी की चक्की मा मि पिसेणू छो ।।

अभी त एक पेट च भोळ होला द्वी से चार। 
          खेती बाड़ी मा कुछ होन्दू नीच  कख बटी लाण आहार। 
                  कपड़ो पर राला टल्ला मेरा चप्पल राला उल्टा सुल्टा। 
                       नोंना मांगला काफी किताब जनेनी फोड़ेली खाली फुल्टा (बर्तन)।
बस यी बात सोची सोची की मि घिसणू  छो। 
बेरोजगारी की चक्की मा मि पिसेणू छो। 
ज़िन्दगी का बोझ  तोळ मि दबेणू छो । ।

  
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