मुझे और मेरे पहाड़ को बेरोजगार भत्ता का आलस्य नहीं रोजगार चाहिए।
मुझे अपने गाँव शहर में पलायन नहीं इन खेत और घरों में बहार चाहिए।
मुझे मेरी जातियों में आरक्षण नहीं स्कूल और महाबिद्यालय चाहिये।
मुझे मेरे शहर में मदलालय नहीं हर गाँव में औषधलय चाहिये।
मुझे अपने हिमालय में पर्यावरण के अनकूल बिकास चाहिये।
लाखो घरों में अन्धेरा करके नहीं ऐसा बिनाश चाहिये।
मुझे बृद्ध पेन्सन नहीं अपने और अपनों का दुलार चाहिये।
मुझे अपने पर बोझ ना समझे उन्हें ऐसे संस्कार चाहिये।
अपनी भूमि के बिकास के लिये अग्रिम रहे ऐसा युवा और मातृ शाक्ति चाहिये।
हला कामान के कहने पर चले जो नेता, नहीं ऐसे नेताओं की पंक्ति चाहिये।
मुझे भ्रस्टाचारी प्रशासन नहीं अधिकारी ईमानदार चाहिये।
जनता की हितों की रक्षा करे जो ऐसी सरकार चाहिये।
आज से दस वर्ष पहले थे मुझे ऐसे उत्तराखंडी जन चाहिये।
नव अपनाये पर अपनी संस्कृति भाषा ना भूले ऐसा उत्तराखंडी मन चाहिये।
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मुझे अपने गाँव शहर में पलायन नहीं इन खेत और घरों में बहार चाहिए।
मुझे मेरी जातियों में आरक्षण नहीं स्कूल और महाबिद्यालय चाहिये।
मुझे मेरे शहर में मदलालय नहीं हर गाँव में औषधलय चाहिये।
मुझे अपने हिमालय में पर्यावरण के अनकूल बिकास चाहिये।
लाखो घरों में अन्धेरा करके नहीं ऐसा बिनाश चाहिये।
मुझे बृद्ध पेन्सन नहीं अपने और अपनों का दुलार चाहिये।
मुझे अपने पर बोझ ना समझे उन्हें ऐसे संस्कार चाहिये।
अपनी भूमि के बिकास के लिये अग्रिम रहे ऐसा युवा और मातृ शाक्ति चाहिये।
हला कामान के कहने पर चले जो नेता, नहीं ऐसे नेताओं की पंक्ति चाहिये।
मुझे भ्रस्टाचारी प्रशासन नहीं अधिकारी ईमानदार चाहिये।
जनता की हितों की रक्षा करे जो ऐसी सरकार चाहिये।
आज से दस वर्ष पहले थे मुझे ऐसे उत्तराखंडी जन चाहिये।
नव अपनाये पर अपनी संस्कृति भाषा ना भूले ऐसा उत्तराखंडी मन चाहिये।
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