यी चका चौंद देखी की ऍग्यों मी प्रदेश।
अन्ख्यूं मा आंसू आणन अब ज्यू बोनू जाणो गढदेश।।
कब लगेली बडूली मेते कब आलू कुवें की डाई कू बुलावा।
कब पुकारेली मेरा मुल्के घुघती कि बोडी जा लाठ्यावा।
देव भूमि की माटे की ख़ुशबू क्वी कब मेकू ते लालू।
सहारा लग्यूं छों कब मेकू ते मेरा पित्रूँ कू रैबार आलू।
सौन्धी सौन्धी खुशबू कब आली, कब लगेली स्वला पकोड़ी मेश।
अन्ख्यूं मा आंसू आणन अब ज्यू बोनू जाणो गढदेश।।
सुप्न्यो मा ही रैगी मेमा अब गोउ भैंस्यू कू घ्यू।
तरसी ग्यों मि देखणू कू अपड़ा मुल्क को हिवू।
कब गोऱ्या छोरों की बंसुई बौण मेरा कन्दडयू मा पोड़ेली।
कब बिधाताड्यों मेरी या लोभ लालंच की नींद तोड़ेली।
रिश्ता नातो की खाँथड़ी हटेकी अब ढुढणू छो खेश।
अन्ख्यूं मा आंसू आणन अब ज्यू बोनू जाणो गढदेश।।
न काफल हिंसर चखणू छो न खिल्द देखणू छो फ्योली बुरांस।
न पञ्चमी का मेला नहेणू छो मि न बस्द देखणू छो हिलांस।
न दौ दगड्यों कू दगडू च मेमा न गाँव वलों कू प्यार।
जै चीज ते मि जीत समझुणू छो वी मेकू ते बणगी हार।
पैथर छुटी ग्यों मी हैरी की ज़िन्दगी की रेश।
अन्ख्यूं मा आंसू आणन अब ज्यू बोनू जाणो गढदेश।।
प्रदीप सिंह रावत '' खुदेड़''
''फ्योली की अन्ख्यूं माँ आँसू'' पुस्तक बटी
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अन्ख्यूं मा आंसू आणन अब ज्यू बोनू जाणो गढदेश।।
यी तेज तरार ज़िन्दगी मा मी एंट्यू छो ।
अब पशचताणू मी कपाल पकड़ी की बैट्यू छो।
रौंतेलू मुल्क छोड़ी मिन हवा छोड़ी, छोड़ी ठन्डू पाणी।
घुट घुटी मोन मिन ईख, इन मिन कते नि जाणी।
आत्मा त मैली व्हेगी मेरि अब शरील रैगी शेष ।
अन्ख्यूं मा आंसू आणन ज्यू बोनू जाणो कू गढदेश।।
कब लगेली बडूली मेते कब आलू कुवें की डाई कू बुलावा।
कब पुकारेली मेरा मुल्के घुघती कि बोडी जा लाठ्यावा।
देव भूमि की माटे की ख़ुशबू क्वी कब मेकू ते लालू।
सहारा लग्यूं छों कब मेकू ते मेरा पित्रूँ कू रैबार आलू।
सौन्धी सौन्धी खुशबू कब आली, कब लगेली स्वला पकोड़ी मेश।
अन्ख्यूं मा आंसू आणन अब ज्यू बोनू जाणो गढदेश।।
सुप्न्यो मा ही रैगी मेमा अब गोउ भैंस्यू कू घ्यू।
तरसी ग्यों मि देखणू कू अपड़ा मुल्क को हिवू।
कब गोऱ्या छोरों की बंसुई बौण मेरा कन्दडयू मा पोड़ेली।
कब बिधाताड्यों मेरी या लोभ लालंच की नींद तोड़ेली।
रिश्ता नातो की खाँथड़ी हटेकी अब ढुढणू छो खेश।
अन्ख्यूं मा आंसू आणन अब ज्यू बोनू जाणो गढदेश।।
न काफल हिंसर चखणू छो न खिल्द देखणू छो फ्योली बुरांस।
न पञ्चमी का मेला नहेणू छो मि न बस्द देखणू छो हिलांस।
न दौ दगड्यों कू दगडू च मेमा न गाँव वलों कू प्यार।
जै चीज ते मि जीत समझुणू छो वी मेकू ते बणगी हार।
पैथर छुटी ग्यों मी हैरी की ज़िन्दगी की रेश।
अन्ख्यूं मा आंसू आणन अब ज्यू बोनू जाणो गढदेश।।
प्रदीप सिंह रावत '' खुदेड़''
''फ्योली की अन्ख्यूं माँ आँसू'' पुस्तक बटी
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