आओ चलो चले अपने उस गाँव |
जहाँ मैने सबसे पहले रखे थे अपने पाँव |
आओ चलो चले अपने उस गाँव ||
जहाँ आज भी उस कूड़ी (घर ) ने पलके बिछायी है मेरी राह |
जहाँ आज भी भ्यारे में पैणू रखा है मेरे आने की चाह में |
वह चारगाह आज भी खोज रही हमें जहाँ हम गाय चारते थे |
वह खेते खलियान भाववीन है जहाँ हम बैल लड़ाते थे |
सूनी सूनी है उन उढयारों की छाँव |
वह खेते खलियान भाववीन है जहाँ हम बैल लड़ाते थे |
सूनी सूनी है उन उढयारों की छाँव |
आओ चलो चले अपने उस गाँव ||
कीड़े बहुत हो गए है उस गुट्यार में जहाँ हम मुर्गियों को कूर कूर करते थे|
सूने सूने वह कुम्चरे है जहाँ हम छुपम छुपायी में छूप जाते थे |
वह बाजू आज भी कड़कड़ी है जिस पर हम नाक पोछते थे |
वह झाड़ जख्याण कबाड़ से भर गए है जहाँ हम मुगफली के लिए बोतल खोजते थे |
वह झाड़ जख्याण कबाड़ से भर गए है जहाँ हम मुगफली के लिए बोतल खोजते थे |
आवो पत्थर के पैन्सो का खेले फिर एक दावँ |
आओ चलो चले अपने उस गाँव ||
कभी कभी तो हमारी नादानिया ज़िन्दगी और मौत से आगे निकल जाती थी |
माँ बाप की मार पड़ते ही हमारी कमसिन उम्र रो रो के पश्यताप करती थी
कलम घिस जाएगी कागज कम पद जाएगा फिर भी मै बचपन की यादों को बयाँ न कर पाऊँगा |माँ बाप की मार पड़ते ही हमारी कमसिन उम्र रो रो के पश्यताप करती थी
क्या मै इतना खुश नसीब हूँ जो मै वही उस घर उस गली पर ही मर पाऊँगा |
बस यारों अब और मत कुरेदो मेरे घाव |
आओ चलो चले अपने उस गाँव ||
प्रदीप सिंह रावत ''खुदेड़''
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