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Saturday, January 4, 2014

सुप्न्यों की बांद

ना सुप्न्यु छो ना भैम, बस छै हकी-कात ।  
कोथिग उरयु छो तीन चार बजी की छै बात।
कबि की कल्पना से भी परे छाई वा, 
लगणी कै सौह सभ्यता घारे छाई वा।
झणी किजणी इनु क्या छो तै परे, 
मनखी त छोड़ा बोण पंछी भी छा ल्य परे। 
अटगिई  मिन वींतै मुड़ी बटी मथि तक, 
सुप्न्यों मा भी नि देखि मिन इनी नोनी अभी तक।
समझ नि अणि छै  मेरा क्यांकि दगड़ा कैरू मि तैकी उपमा, 
कायनात भी सरमाणी छै इत्गा तेज छो तैंका मुखमा। 
हिटई छाई तैंकी पर जन बुलेंद, अभी लच्ग्दी तैंकी कमर, 
ज्यादा ना, सतरा सवा सतरा साले की छै तैंकी उमर 
कुछ पल सही पर मेरि अन्ख्युं अदभुत आनंद कु एसाहस काई, 
घड़े को तै मेरि मूलभूत आवश्कता सांस, उन्दै की उन्द उबे की उब रुकी छाई। 
शुक्र समझा की मेरा संग चलित दूरभाष की घंटी बज ग्याई,  
तब मेरु शरील झररररर व्हकी, मेते होश आई।
ओझल व्हेग्यी जनि कन  बैट्यों मि दूरभाष मा बात, 
झणी किझणी कख फुरररररर वाई वा मि मल्दी रैग्यों हाथ।
अब समझ नि आणू चा जैन मेरा दूरभाषे की घंटी बजाई 
वे तै मि गली दयों, या फिर चढ़ों वेपर फूल पिटाई 
एक तरफ ता वे बिचरन मेरी ज्यान बचाई,
दूसरी तरफ उ मेरी जिंदगी लुछी लिग्याई।

अगर कैते तै नोनी की सैदा या लग्जालू पता, 
कृपया चरित्र पुस्तक (फेसबुक) मा मेतै बताणे कै दें खता। आभारी रोलु मि तुमारु, ता उम्र रोलु ऋणी, तुमरी बताई सैदां सुप्न्यों की बांद मिल जली मेसाणी। 


  प्रदीप सिंह रावत  ''खुदेड़''
 (फ्योली की अन्खुन मा आंसू)
सर्व अधिकार सुराक्षित 

 

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