ये
आकाश आज क्यों
इतना उदास है
शायद
आज चाँद नहीं
इसके पास है
कभी
हजारों सितारे खेलते थे
इसकी गोद में
आज
ये खुद बैठा
है अँधेरे के आगोश
में
ये
बादल क्यों आज
इतना बेदर्द है
शायद
आज पूरव से
नहीं आई हवा
सर्द है
कभी
कभी ऐ झूम
के बरसता है
पर
आज ऐ खुद
पर तरसता है
आज
ऐ सूरज की
तपन में तप
रहा है
खुद
आज ऐ खुदा
का नाम जप
रहा है
आज
ये पहाड़ क्यों
दर्द से कहरा
रहा है
शायद
आज कोई फिर
इसके सिने में
आरी चला रहा
है
जिस
पेड़ को इसने
बड़े आरमान से
सीचा था
आज
कोई लकहरा उसे
काट ले गया
इस
बेचारे को अपने
से बिछड़ने का गम
दे गया
इस
नदी ने आज
फिर क्यों किया
है मौन धारण
शायद मानव ने
आज फिर एक
और गटर का
नाला इसमें मिला
दिया यही इसका
कारण है
ये नदी अपने आप को कभी भी नहीं करेगी माफ़ इंसान की करतूतों के कारण अपने नन्हें बच्चों को मारकर कर रही है पाप
प्रदीप रावत खुदेड़
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