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Saturday, January 4, 2014

मौन धारण

ये आकाश आज क्यों इतना उदास है 
शायद आज  चाँद नहीं इसके पास है
कभी हजारों सितारे खेलते थे इसकी गोद  में
आज ये खुद बैठा है अँधेरे के आगोश में 

ये बादल क्यों आज इतना बेदर्द है 
शायद आज पूरव से नहीं आई हवा सर्द है 
कभी कभी ऐ झूम के बरसता है 
पर आज ऐ खुद पर तरसता है 
आज ऐ सूरज की तपन में तप रहा है 
खुद आज ऐ खुदा का नाम जप रहा है 

आज ये पहाड़ क्यों दर्द से कहरा रहा है 
शायद आज कोई फिर इसके सिने में आरी चला रहा है 
जिस पेड़ को इसने बड़े आरमान से सीचा था 
आज कोई लकहरा उसे काट ले गया 
इस बेचारे को अपने से बिछड़ने का गम दे गया 

इस नदी ने आज फिर क्यों किया है मौन धारण 
शायद मानव ने आज फिर एक और गटर का नाला इसमें मिला दिया यही इसका कारण है
ये नदी अपने आप को कभी भी नहीं करेगी माफ़
इंसान की करतूतों के कारण अपने नन्हें बच्चों को मारकर कर रही है पाप 

प्रदीप रावत    खुदेड़


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