रात दिन वी छन सूरज चाँद जख्या तखी
रीत रिवाज बदलेगेन मनखी भरमेगी कखी
नि खेल्दन लांग भेला अब, अब नि रिन्गदू जन्दूरू
नि लगान्दन गोरू की गोट अब, अब नि बोटेन्दू मन्दूरू
कोथवा भी सैड़ी गेन अब, घट पोड़ीगेन गदनियों मा बांझा
कोना कोठ्यार भी टूट गेन अब, गंजेल्यु पर नि छन गांजा
खाण पेणा तरिका बद्लेगेन अन्न पाणी जख्या तखी
रीत रिवाज बद्लेगेन मनखी भरमेगी कखी
नि बजान्दन ढोल अब ओज़ी, अणस्योवू नि लगादन लोहार
नि बाणादन भोज सरोवा, नि मनादन लोग अब बार त्यौहार
नि खायेंदीन चूने की रोटि अब, नि स्वादया व्हेगी भट भटोणी
नि पियेणू पयो छछेंन्डू अब, नि घुटेणू च गैथो कू गथोणी
बोली भाषा बद्लेगेन आकाश धरती जख्या तखी
रीत रिवाज़ बद्लेगेन मनखी भरमेगी कखी
भिया नी देखणू क्वी विकास का बथों मा सब उड़णा छन
धन दोलत सब कुछ व्हेकी ते भी द्वी घड़ी कू चैन खोजणा छन
देबतों की भूमि आज इख मनख्यू कू ते तरसणी च
गाड गदन्यू मा इख अब डामू की डडवार बरसणी च
हिव गोळी की बदलेगी हिमालिया जख्या तखी
रीत रिवाज बद्लेगेन मनखी भरमेगी कखी
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